खातीसमाज : इतिहास के झरोखे से
खाती समाज भारतीय वर्ण व्यवस्था की एक ऐसी कड़ी है जिसका प्राचीन इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। बावजूद इसके अपनी एकांतप्रियता, ग्रामीण परिवेश, अशिक्षा एवं इन सबके कारण उपजी कुरीतियों-कुप्रथाओं और संकीर्णताओं के परिणामस्वरूप खाती समाज सैकड़ों सालों से पिछड़ता चला आ रहा है। इतिहासकारों और समाज शास्त्रियों ने भी इस समाज का अध्ययन करने की आवश्यकता महसूस नहीं की। जनगणना के आंकड़ों से साफ है कि समाज अभी भी कई मामलों में आज की दुनिया से बहुत पीछे है। इस पिछड़ेपन को दूर करने का एक ही उपाय है और वह है शिक्षा।
यदि प्राचीन इतिहास एवं भाट तथा चारणों की पोथियों को देखा जाए तो भी साफतौर पर पता नहीं चलता कि खाती समाज के पूर्वज मूलतः आर्य की किस शाखा से संबंधित हैं। यदि आर्य भारत में बाहर से आए तो हमारे पूर्व समाजजन भारत के किस भूभाग के निवासी बने। इन चर्चाओं को लेकर कुछ लिखित एवं प्रचलित मान्यताएं इस प्रकार हैं :-
खाती समाज आज से लगभग साढ़े चार हजार साल पहले महाराजा कार्तवीर्य अर्जुन अर्थात सहस्रबाहू के वंशजों से उत्पन्न हुआ। महाराज सहस्रबाहू की मृत्यु के बाद उनके 105 पुत्रों से जो वंश चला वह समग्न रूप में खाती समाज कहलाया। क्षत्रीय अर्थात 'क्षात्र' परंपराओं का परित्याग करने के कारण ही इन्हें खत्री अथवा 'खाती' कहा गया। प्राकृत भाषा शब्दकोषों में खाती शब्द का अर्थ है खनन अर्थात खुदाई कार्य करने वाला। साफतौर पर यह एक व्यावसायिक अर्थ का द्योतक है।
ऐसा प्रतीत होता है कि बंजर धरती को खोदकर खेती योग्य भूमि बनाने वाले लोगों को कालान्तर में खाती की संज्ञा दी गई। मूलपुरुष सहस्रबाहु के नाम को यदि उपाधि मान लिया जाए तो उसके अन्य अर्थों के साथ-साथ यह भी एक अर्थ होता है कि जिसकी धरती पर हजारों हलों की जुताई की जाती हो। वह युग भारत में खेती संस्कृति के विकास का युग था। प्रारंभ में जिन वंशजों ने खेती के कार्य को अपना लिया, वे खाती कहलाए। भगवान परशुराम भार्गव भगवान रामचंद्र के समकालीन थे। इन्हीं परशुराम भार्गव ने नर्मदा के समीप महिस्मति नगरी अर्थात महेश्वर के चक्रवर्ती सम्राट सहस्रबाहु को पराजित किया। आज भी महेश्वर में हमारी जाति के मूल पुरुष सहस्रबाहु की समाधि राजराजेश्वर मंदिर
के रूप में विद्यमान है। परशुराम भार्गव उस युग में फैली अराजकता, हिंसा और धरती तथा साम्राज्य के लिए लड़े जाने वाले युद्धों के विरोधी थे। वे धरती को महिदेवों में बांट देना चाहते थे। सहस्रबाहु इस नजरिये से उनका प्रथम लक्ष्य बने। उन्हें पराजित करने के बाद मिथिला नरेश जनक की प्रार्थना पर जिन पुत्रों को प्राणदान मिला, उन्हें यह निर्देश भी मिले कि आने वाले समय में वे तथा उनके वंशज खेती कर्म करते रहेंगे तथा राज्य लिप्सा से दूर रहेंगे। इस लिहाज से यह व्यवस्था एक पराजित राजवंश का स्थायी तथा शांतिपूर्ण पुनर्वास थी। यद्यपि सहस्रबाहु के अनेक पुत्रों ने अलग-अलग व्यवसाय अपनाए। कुछ छोटे-छोटे भू-भागों के शासक भी रहे और कालांतर में विशाल सामाज्यों के संस्थापक बने। कई वंशजों से कालांतर में जातीय वर्गों का विकास भी हुआ। 105 पूत्रों ने अपनी माता और अन्य परिजनों के साथ खेती का कार्य स्वीकार कर खाती समाज की आधारशिला रखी। ये सब मूलतः चंद्रवंशी ही माने गए और बलभद्र गोत्रीय कहलाए।
बलभद्र गोत्र भी अपना खास महत्व रखता है। भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाता बलदेव को बलभद्र के साथ-साथ हलधर भी कहा जाता था। इसका अर्थ है हल के माध्यम से श्रमशक्ति द्वारा सुख और समृद्धि प्राप्त करने वाला अर्थात किसान.../ राजराजेश्वर सहस्रबाहु का गोत्र भी बलभद्र था। अतः आज भी खाती समाज ने इस उपनाम के साथ अपनी कुल परंपरा की एक कड़ी बचा रखी है।
आस्पद और पदवी बनते रहे हैं समाज की पहचान
खाती समाज को आज गोत्र की अपेक्षा आस्पदों, पदों एवं उपाधियों के माध्यम से जाना जाता है। ये लोग जिन गांवों को अपना मूल निवास 'आस्पद' मानते हैं, उन्हीं के नामों से अपनी पहचान जोड़ते हैं। उदाहरण के लिए खाचरौद से खाचरोदिया, तिलावद से तिलावद्या, करंज से करंजिया, बीजलपुर से बीजलपुरिया आदि। इसी प्रकार चौधरी, मुकाती मंडलोई तथा पटेल उपनाम उनके पूर्वजों को प्राप्त पदो के परिचायक हैं। इस जाति की कोई डायरेक्टरी या वंश परिचय भी प्रकाशित नहीं है। इसलिए जानकारी के लिए अब तक भाट व चारणों की पोथियों पर यह समाज आश्रित रहा है।
अध्ययन एवं खोज के दौरान पुरानी पोथियों में इस समाज की उत्पत्ति का एक सिद्धांत यह भी बतलाया गया है कि मांडू सुलतानों के समय गुजरात से जो बुनकर जाति के व्यवसायी मालवा आए वही बाद में खाती कहलाए। राजस्थान में सुतार जाति भी खाती कही जाती है। इससे यह तथ्य साफ होता है कि प्रारंभ में खेती तथा उससे जुड़े व्यवसाय जैसे हल व बैलगाड़ी बनाने वाले सुतार आदि का सामूहिक समाज खाती समाज कहलाता था। जाति के रूप में बहुत बाद में इस समाज को प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। कालांतर में अन्य गोत्रों के लोग भी इस समाज के अंग बनते गए।
इतिहासकारों की एक और संभावना है जो इस समाज की उत्पत्ति का संकेत देती है। उनकी मान्यता है कि आज से लगभग दो हजार साल पहले सेंट्रल एशिया से शासक छत्रपों के वंशज भारत आए और कश्मीर, मथुरा, उज्जैन तथा भडोंच के आसपास का भूभाग जीतकर अपना साम्राज्य स्थापित किया। मालवा में खखरात 'क्षहरात' वंश के शासकों का शासन था। खखरात लोग शिव भक्त थे और कालांतर में यहीं के निवासी होकर रह गए। कालांतर में यह खखराती खाती कहलाए। यह भी मान्यता है कि हितेशिया की हेट्टी जाति के जो लोग भारत आकर खेती व्यवसाय आदि में संलग्न हो गए, वे खाती कहलाए। परंपरानुसार समाज के वृद्धजन भी यही कहते हैं कि खाती लोग कश्मीरी हैं अथवा मालवा के मूल निवासी नहीं हैं। वैसे खाती जाति अपने रूप-रंग, नाक-नक्श तथा पहनावे के कारण अपना अलग ही स्थान रखती है। खानपान की कुछ परंपराएं भी इस जाति में महत्वपूर्ण है। महाभारत ग्रंथ के कर्ण-शल्य संवाद में मद्रक यवनों के खानपान की चर्चा में कहा गया है कि मद्रक लोग प्याज को कूच कर खाते हैं। यह प्रथा खाती जाति में आज भी विद्यमान है। अतः इन संभावनाओं की भी खोज की जाना चाहिए कि वास्तव में खाती जाति का इतिहास कहां से प्रारंभ होता है। खाती लोग स्वयं को चंद्रवंशीय मानते हैं। पौराणिक वंशावलियों में सहस्रबाहु के अलावा युधिष्ठिर आदि को भी चंद्रवंशी लिखा गया है। चंद्रवंश की अनेक उपशाखाएं हैं। उनमें से चंद्रवंशी खाती भी एक है।
हजारों सालों के प्राचीन इस समाज को अपना गौरव प्राप्त करना होगा। अपनी स्वतंत्र पहचान खोजना होगी। अपने रीति-रिवाज, संस्कार, वेशभूषा, खानपान, रहन-सहन, देवी-देवताओं, सती-भेरू व पाटली की स्वतंत्र पहचान बनाना होगी। इसे आज का शिक्षित समाज ही कर सकता है। सम्मिश्रण के इस युग में हम अपने पूर्वजों की धरोहर को यदि संभाल नहीं पाए तो आने वाली पीढ़ियां हमारी अज्ञानता का कलंक ओढ़ने को मजबूर होगी। अतः समय रहते जो लोग ऐसे कार्यों को करना चाहते हैं, उन्हें उसे निःस्वार्थ भाव से सामाजिक हित में करने के लिए आगे आना होगा। गांवों में बिखरे समाज की जानकारी संकलित करना होगी। इस कड़ी में जो भी लोग कार्य कर रहे हैं, वह स्वागतयोग्य है।
आज पूरे देश में अलग-अलग समाज के लोग संगठित होकर अपनी पहचान बना रहे हैं। विभिन्न समाजों के पारमार्थिक ट्रस्ट हैं, अस्पताल हैं; किंतु खाती समाज आर्थिक रूप से संपन्न होकर भी पिछड़ा हुआ है। समाज का कोई मैरेज ब्यूरो नहीं है, सहकारी संस्थाएं, हास्पिटल एवं स्कूल, कालेज नहीं हैं। पूरा समाज अंतर्मुखी हो चुका है। कार्य है, लेकिन कार्यकर्ता नहीं हैं। यदि समाज के बुजुर्गों के मार्गदर्शन में युवकों द्वारा महत्वपूर्ण कार्यों को अपने हाथों में लिया जाए, तो सामाजिक स्थिति में सुधार आ सकता है।
गोविन्द सिंह बलभद्र (लेखक खाती वंश) के अनुसार