चन्द्रवंशी खाती समाज भारतीय वर्ण व्यस्था की एक ऐसी कड़ी है, जिसका प्राचीन इतिहास अत्यंत गौरव शाली है। ऐसा माना जाता है कि खाती समाज का उद्भव आज से लगभग साढ़े चार हजार वर्ष पहले राजा कीर्तिवीर्य अर्जुन अर्थात सहस्र्बाहु के वंशजों से उत्पन्न हुआ है। वही दूसरी और एक एक अन्य मान्यता के अनुसार खाती समाज भगवन परशुराम जी के आशीर्वाद से उत्पन्न समाज है। क्षत्रिय खाती समाज मूलतः जम्मू कश्मीर के अभेपुर और नभेपुर के मूल निवासी है आज भी चंद्रवंशी लोग हिमालय क्षेत्र में केसर की खेती करते है । समाज ने १२०० वर्ष पहले से ही जम्मू-कश्मीर से पलायन करना प्रारम्भ कर दिया था और भारत के अन्य राज्यों में बसने लग गया था । देश के अन्य राज्यों से पलायन करते हुए खेती की भूमि की उपलब्धता के चलते मध्य प्रदेश में रहने लगे अपनी कड़ी मेहनत और परिश्रम से समाज के लोगों ने यहाँ की बंजर भूमि को भी उपजाऊ बना लिया। खेती के कार्यों को संपन्न करने के लिए अत्यधिक संख्या बल की आवश्यकता के कारण समाज के लोगों में संयुक्त परिवार में रहने की संस्कृति रही है। जिससे समाज के लोगों में सामंजस्यता के गुणों का उद्धभव हुआ जो समाज की संस्कृति के रूप में पहचानी जाती है एवं खाती समाज की सबसे बड़ी विशेषता है। समाज के कुल १०५ गोत्र है जिसमे से ८४ गोत्र मध्यप्रदेश में है और मध्यप्रदेश के १६ जिलो में है, और १२५० गाँवों में निवास करते है ।
ध्यप्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में चंद्रवंशी खाती समाज के इष्ट देव जगदीश का भव्य प्राचीन मंदिर है जहा हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितिय को भगवान की रथयात्रा निकलती है समाज जन और भक्तजन अपने हाथो से रथ खींचकर भगवान को नगर भ्रमण करवाते है |
समाज के लोग प्राचीन कल से ही मेहनती रहे हैं, इसलिए खेती एवं पशुपालन समाज का व्यवसाय रहा है, किन्तु समय काल एवं परिस्थितियों के चलते समाज के लोगों ने भी समय के अनुसार समय के साथ चलना सीखा।
ध्यप्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में चंद्रवंशी खाती समाज के इष्ट देव जगदीश का भव्य प्राचीन मंदिर है जहा हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितिय को भगवान की रथयात्रा निकलती है समाज जन और भक्तजन अपने हाथो से रथ खींचकर भगवान को नगर भ्रमण करवाते है |
समाज के लोग प्राचीन कल से ही मेहनती रहे हैं, इसलिए खेती एवं पशुपालन समाज का व्यवसाय रहा है, किन्तु समय काल एवं परिस्थितियों के चलते समाज के लोगों ने भी समय के अनुसार समय के साथ चलना सीखा।
ध्यप्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में चंद्रवंशी खाती समाज के इष्ट देव जगदीश का भव्य प्राचीन मंदिर है जहा हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितिय को भगवान की रथयात्रा निकलती है समाज जन और भक्तजन अपने हाथो से रथ खींचकर भगवान को नगर भ्रमण करवाते है |
समाज के लोग प्राचीन काल से ही मेहनती रहे हैं, इसलिए खेती एवं पशुपालन समाज का व्यवसाय रहा है, किन्तु समय काल एवं परिस्थितियों के चलते समाज के लोगों ने भी समय के अनुसार समय के साथ चलना सीखा।
ध्यप्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में चंद्रवंशी खाती समाज के इष्ट देव जगदीश का भव्य प्राचीन मंदिर है जहा हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितिय को भगवान की रथयात्रा निकलती है समाज जन और भक्तजन अपने हाथो से रथ खींचकर भगवान को नगर भ्रमण करवाते है |
समाज के लोग प्राचीन कल से ही मेहनती रहे हैं, इसलिए खेती एवं पशुपालन समाज का व्यवसाय रहा है, किन्तु समय काल एवं परिस्थितियों के चलते समाज के लोगों ने भी समय के अनुसार समय के साथ चलना सीखा।ध्यप्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन में चंद्रवंशी खाती समाज के इष्ट देव जगदीश का भव्य प्राचीन मंदिर है जहा हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितिय को भगवान की रथयात्रा निकलती है समाज जन और भक्तजन अपने हाथो से रथ खींचकर भगवान को नगर भ्रमण करवाते है |
समाज के लोग प्राचीन कल से ही मेहनती रहे हैं, इसलिए खेती एवं पशुपालन समाज का व्यवसाय रहा है, किन्तु समय काल एवं परिस्थितियों के चलते समाज के लोगों ने भी समय के अनुसार समय के साथ चलना सीखा।